पाकिस्तान से छपने वाले उर्दू अख़बारों में इस हफ़्ते सबसे बड़ी ख़बर रही इमरान ख़ान के मंत्रिमंडल में फेरबदल की.
गुरुवार यानी 18 अप्रैल को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के कार्यालय से जारी एक बयान में कहा गया कि कैबिनेट में फेरबदल कर पांच मंत्रियों के पोर्टफ़ोलियो को बदल दिया गया है.
इनमें सबसे प्रमुख नाम हैं वित्त मंत्री असद उमर और सूचना एंव प्रसारण मंत्री फ़व्वाद चौधरी.
पिछले कुछ दिनों से पाकिस्तानी मीडिया में इस तरह की ख़बरें चल रहीं थीं कि कई मंत्रियों के कार्यभार में बदलाव हो सकता है. लेकिन उस समय सूचना एवं प्रसारण मंत्री फ़व्वाद चौधरी ने न केवल उन अटकलों को ख़ारिज कर दिया था बल्कि मीडिया से अपील की थी कि वो ज़िम्मेदारी से अपना काम करें क्योंकि उनके मुताबिक़ इस तरह की अफ़वाह फैलाने से देश का नुक़सान होता है.
अख़बार जंग ने मंत्रिमंडल में फेरबदल पर सुर्ख़ी लगाई है, ''केंद्रीय कैबिनेट के बुर्ज़ उलटा दिए गए.''
अख़बार के अनुसार, वित्त मंत्री असद उमर ने ख़ुद ट्वीट कर इस बात की जानकारी दी. उनका कहना था, ''कैबिनेट रीशफ़ल में प्रधानमंत्री चाहते हैं कि मैं वित्त मंत्रालय की जगह ऊर्जा मंत्रालय की ज़िम्मेदारी संभाल लूं. लेकिन मैंने उनकी मर्ज़ी से फ़ैसला किया है कि मैं कोई भी मंत्रालय नहीं लूंगा.''
इमरान ख़ान के नेतृत्व पर पूर्ण विश्वास जताते हुए उन्होंने कहा कि इमरान ख़ान पाकिस्तान की सबसे बड़ी उम्मीद हैं और नया पाकिस्तान ज़रूर बनेगा.
असद उमर को ऐसे समय में वित्त मंत्रालय से हटाया गया है जब पाकिस्तान को बेलआउट पैकेज देने पर आईएमएफ़ से पाकिस्तान की बातचीत चल रही है.
अख़बार जंग के मुताबिक़, असद उमर ने इस्तीफ़ा देने के बाद प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा कि उन्हें एक रात पहले ही पता चला कि उनको वित्त मंत्रालय से हटाया जा रहा है. उन्होंने कहा कि वो अपने कार्यकाल में कामयाब रहे या नाकाम इसका फ़ैसला इतिहास करेगा.
उन्होंने कहा कि संभव है कि इमरान ख़ान को लगा हो कि उन पर जो दबाव है किसी नए चेहरे से वो दबाव कम हो. उन्होंने कहा कि पांच साल के बाद लोग ख़ुद कहेंगे कि इमरान ख़ान जो कहता था, कर दिखाया.
असद उमर को वित्त मंत्रालय से हटाए जाने पर विपक्ष ने इमरान ख़ान को घेरने की कोशिश की है.
अख़बार एक्सप्रेस के अनुसार, विपक्षी मुस्लिम लीग (नवाज़ गुट) ने असद उमर के इस्तीफ़े को इमरान सरकार की वित्तीय नीति की नाकामी क़रार दिया है.
पार्टी के अध्यक्ष शहबाज़ शरीफ़ ने कहा कि इमरान ख़ान को अपनी ज़िद और घमंड छोड़कर अर्थव्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए.र उन्होंने कहा कि अगर और वक़्त बर्बाद किया गया तो देश की अर्थव्यवस्था को गंभीर परिणाम झेलने पड़ेंगे.
पार्टी के एक और नेता हमज़ा शहबाज़ ने कहा कि इमरान ख़ान को भी इस्तीफ़ा दे देना चाहिए.
हमज़ा शहबाज़ का कहना था, ''खिलाड़ी बदलने से अर्थव्यवस्था का मैच नहीं जीता जा सकता. खिलाड़ी नहीं, कप्तान बदलना पड़ेगा. असद उमर का इस्तीफ़ा इमरान ख़ान की अपनी अयोग्यता की स्वीकृति है.''
अख़बार जंग के अनुसार, पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के चेयरमैन बिलावल भुट्टो ज़रदारी ने कहा कि इमरान सरकार को आठ महीने के बाद एहसास हुआ कि उसकी आर्थिक नीति ग़लत है.
पीपीपी के प्रवक्ता मुस्तफ़ा नवाज़ खोखर ने क्रिकेट की ज़ुबान में इमरान ख़ान पर हमला करते हुए कहा, ''देश को मुबारक हो. पीपीपी की मांग पर सरकार की पहली विकेट गिर गई. सरकार की दूसरी विकटें भी जल्द गिर जाएंगी. सरकार की पूरी टीम 50 ओवर से पहले ही पैवेलियन लौट जाएगी.''
अख़बार दुनिया का कहना है कि वित्त मंत्री असद उमर प्रधानमंत्री इमरान ख़ान और कैबिनेट के अधिकतर सहयोगियों का विश्वास खो चुके थे इसलिए उन्हें हटाया गया.
इमरान ख़ान ने अपने फ़ैसले का जमकर बचाव किया है.
अख़बार नवा-ए-वक़्त के अनुसार, एक जलसे को संबोधित करते हुए इमरान ख़ान ने कहा कि जो मंत्री देश के लिए ठीक नहीं होगा उन्हें वो बदल देंगे.
इमरान का कहना था, ''सब सुन लें. जो मंत्री मुल्क के लिए फ़ायदेमंद नहीं होगा उसे बदल दूंगा. मैंने टीम का बैटिंग ऑर्डर चेंज किया है. मेरा उद्देश्य क़ौम को जितवाना है. उस मंत्री को लाउंगा जो क़ौम के लिए फ़ायदेमंद होगा.''
पाकिस्तान में बलोचिस्तान प्रांत के ग्वादर ज़िले में चरमपंथियों ने बस से उतारकर नौ नैसैनिकों समेत कुल 14 लोगों की गोली मार कर हत्या कर दी है.
ये ख़बर भी सारे अख़बारों के पहले पन्ने पर बनी रही. पाकिस्तान ने इस मामले में भारत को घेरन की कोशिश की है.
अख़बार दुनिया के अनुसार पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता डॉक्टर फ़ैसल ने कहा कि 'बलोचिस्तान में दहशतगर्दी में पहले भी भारत का हाथ था और अगर अब भी हुआ तो बेनक़बा कर देंगे.'
एक अन्य ख़बर में पाकिस्तान ने फ़ैसला किया है कि इस साल सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव की जन्म तिथि पर डाक टिकट जारी किया जाएगा.
Monday, April 22, 2019
Tuesday, April 16, 2019
IPL: हार का दूसरा नाम क्यों बन गई है विराट कोहली की बैंगलोर रॉयल चैलेंजर्स?
सोमवार को आईपीएल-12 के मुक़ाबले में मुंबई की बल्लेबाज़ी के दौरान बैंगलोर के गेंदबाज़ मोहम्मद सिराज जब अपना दूसरा और पारी का 18वां ओवर कर रहे थे तब कवर में खड़े कप्तान विराट कोहली के पास एक शॉट आया और उसे रोकने की कोशिश में गेंद उनके हाथ से फिसल गई.
निराश विराट कोहली ने जैसे-तैसे उसे संभाला और फिर ग़ुस्से में पांव से सरका दिया.
यह मंज़र बता रहा था कि विराट कोहली अपनी टीम के प्रदर्शन से कितने निराश है.
डगआउट में उनकी टीम के कोच आशीष नेहरा का चेहरा भी उतरा हुआ था.
जीत के लिये 172 रनों के लक्ष्य का पीछा कर रही मुंबई इंडियंस के सामने आख़िरी दो ओवर में 22 रन बनाने की चुनौती थी.
नेगी का सामना कर रहे थे हार्दिक पांड्या और उन्होंने अकेले ही इस ओवर में मैच का फ़ैसला कर दिया.
नेगी की पहली गेंद पर तो कोई रन नही बना लेकिन अगली गेंदों पर हार्दिक पांड्या का बल्ला ऐसा गरजा कि बैंगलोर के फ़ील्डर आंखे फाड़े देखते रह गए.
पांड्या ने नेगी की दूसरी गेंद पर लॉन्ग ऑफ़ पर ज़ोरदार छक्का लगाया.
तीसरी गेंद को पांड्या ने एक्स्ट्रा कवर बाउंड्री लाइन के बाहर चार रन के लिए भेजा.
चौथी गेंद पर भी पांड्या ने चौका उड़ाया.
पांचवी गेंद को पांड्या ने बेहद ज़ोरदार शॉट के ज़रिए लॉन्ग ऑन पर छक्के की राह दिखाई.
इसके बाद तो बस जीत की ओपचारिकता ही रह गई थी.
आखिरी गेंद पर एक रन के साथ मुंबई ने यह मैच 19 ओवर में पांच विकेट खोकर हासिल कर लिया.
हार्दिक पांड्या 16 गेंदों पर पांच चौके और दो छक्कों की मदद से 37 रन बनाकर नाबाद रहे.
उनके अलावा सलामी बल्लेबाज़ क्विंटन डी कॉक ने 40, कप्तान रोहित शर्मा ने 28, सूर्यकुमार यादव ने 29 और ईशान किशन ने भी 21 रन का योगदान दिया.
इससे पहले रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर ने टॉस हारकर पहले बल्लेबाज़ी की दावत पाकर एबी डिविलियर्स के 75 और मोईन अली के 50 रनों की मदद से निर्धारित 20 ओवर में सात विकेट खोकर 171 रन बनाए.
डिविलियर्स और मोईन अली के अलावा सलामी बल्लेबाज़ पार्थिव पटेल ने 28 रन बनाए.
बाकी बल्लेबाज़ों का तो ये हाल था कि ख़ुद कप्तान विराट कोहली आठ और आकाशदीप नाथ दो रन बना सके.
मारकस स्टॉयनिस और पवन नेगी के बल्ले से कोई रन नहीं निकला.
मुंबई के लसिथ मलिंगा ने अपनी पुरानी रंगत दिखाते हुए 31रन देकर चार विकेट झटके.
आखिरकार लगातार एक के बाद एक हार के बाद के भी बैंगलोर की टीम कप्तान विराट कोहली, एबी डिविलियर्स, स्टोइनिस, मोईन अली और युज़वेंद्र चहल जैसे ख़िलाड़ियों के होते हुए भी संभल क्यों नही सकी.
इस सवाल के जवाब ने क्रिकेट समीक्षक विजय लोकपल्ली कहते हैं कि पहले अगर मुंबई के ख़िलाफ़ हुए मैच की बात करें तो जिस ओवर में हार्दिक पांड्या ने तूफानी बल्लेबाज़ी की, वह ओवर पवन नेगी को देना ही नहीं चाहिए था.से बाहर हो जाएगी.
निराश विराट कोहली ने जैसे-तैसे उसे संभाला और फिर ग़ुस्से में पांव से सरका दिया.
यह मंज़र बता रहा था कि विराट कोहली अपनी टीम के प्रदर्शन से कितने निराश है.
डगआउट में उनकी टीम के कोच आशीष नेहरा का चेहरा भी उतरा हुआ था.
जीत के लिये 172 रनों के लक्ष्य का पीछा कर रही मुंबई इंडियंस के सामने आख़िरी दो ओवर में 22 रन बनाने की चुनौती थी.
नेगी का सामना कर रहे थे हार्दिक पांड्या और उन्होंने अकेले ही इस ओवर में मैच का फ़ैसला कर दिया.
नेगी की पहली गेंद पर तो कोई रन नही बना लेकिन अगली गेंदों पर हार्दिक पांड्या का बल्ला ऐसा गरजा कि बैंगलोर के फ़ील्डर आंखे फाड़े देखते रह गए.
पांड्या ने नेगी की दूसरी गेंद पर लॉन्ग ऑफ़ पर ज़ोरदार छक्का लगाया.
तीसरी गेंद को पांड्या ने एक्स्ट्रा कवर बाउंड्री लाइन के बाहर चार रन के लिए भेजा.
चौथी गेंद पर भी पांड्या ने चौका उड़ाया.
पांचवी गेंद को पांड्या ने बेहद ज़ोरदार शॉट के ज़रिए लॉन्ग ऑन पर छक्के की राह दिखाई.
इसके बाद तो बस जीत की ओपचारिकता ही रह गई थी.
आखिरी गेंद पर एक रन के साथ मुंबई ने यह मैच 19 ओवर में पांच विकेट खोकर हासिल कर लिया.
हार्दिक पांड्या 16 गेंदों पर पांच चौके और दो छक्कों की मदद से 37 रन बनाकर नाबाद रहे.
उनके अलावा सलामी बल्लेबाज़ क्विंटन डी कॉक ने 40, कप्तान रोहित शर्मा ने 28, सूर्यकुमार यादव ने 29 और ईशान किशन ने भी 21 रन का योगदान दिया.
इससे पहले रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर ने टॉस हारकर पहले बल्लेबाज़ी की दावत पाकर एबी डिविलियर्स के 75 और मोईन अली के 50 रनों की मदद से निर्धारित 20 ओवर में सात विकेट खोकर 171 रन बनाए.
डिविलियर्स और मोईन अली के अलावा सलामी बल्लेबाज़ पार्थिव पटेल ने 28 रन बनाए.
बाकी बल्लेबाज़ों का तो ये हाल था कि ख़ुद कप्तान विराट कोहली आठ और आकाशदीप नाथ दो रन बना सके.
मारकस स्टॉयनिस और पवन नेगी के बल्ले से कोई रन नहीं निकला.
मुंबई के लसिथ मलिंगा ने अपनी पुरानी रंगत दिखाते हुए 31रन देकर चार विकेट झटके.
आखिरकार लगातार एक के बाद एक हार के बाद के भी बैंगलोर की टीम कप्तान विराट कोहली, एबी डिविलियर्स, स्टोइनिस, मोईन अली और युज़वेंद्र चहल जैसे ख़िलाड़ियों के होते हुए भी संभल क्यों नही सकी.
इस सवाल के जवाब ने क्रिकेट समीक्षक विजय लोकपल्ली कहते हैं कि पहले अगर मुंबई के ख़िलाफ़ हुए मैच की बात करें तो जिस ओवर में हार्दिक पांड्या ने तूफानी बल्लेबाज़ी की, वह ओवर पवन नेगी को देना ही नहीं चाहिए था.से बाहर हो जाएगी.
Tuesday, April 9, 2019
आईपीएल-12: केएल राहुल ने पिछली हार का पंजाब का कर्ज़ उतारा
आईपीएल-12 में सोमवार को मोहाली में जब मेज़बान किंग्स इलेवन पंजाब और सनराइज़र्स हैदराबाद आमने-सामने थे तो अंतिम ओवर में दर्शकों का शोर पूरे उफान पर था.
इस ओवर में पंजाब को जीत के लिए 11 रन की ज़रूरत थी.
मैदान में सैम करेन और केएल राहुल थे. राहुल को चौथी गेंद पर स्ट्राइक मिली.
उन्होंने आखिरी ओवर कर रहे मोहम्मद नबी के ऊपर से ऊंचा शॉट खेलकर चौका लगाया, और उसके बाद अगली गेंद पर दो रन लेकर पंजाब को जीत दिला दी.
दूसरी तरफ सैम करेन भी नबी की शुरूआती तीन गेंदों पर पांच रन बना चुके थे.
इस मैच में पजांब के सामने जीत के लिए 151 रनों का लक्ष्य था जो उसने केएल राहुल के नाबाद 71 और मयंक अग्रवाल के 55 रनों की मदद से 19.5 ओवर में चार विकेट खोकर हासिल किया.
इससे पहले हैदराबाद ने टॉस हारकर पहले बल्लेबाज़ी करते हुए निर्धारित 20 ओवर में डेविड वार्नर के नाबाद 70 रन की मदद से चार विकेट खोकर 150 रन बनाए.
ज़ाहिर है कि जिस विकेट पर पारी की शुरूआत से अंतिम ओवर तक 62 गेंदों पर छह चौके और एक छक्के की मदद से नाबाद 70 रन बनाने वाले हैदराबाद के अलावा कोई और बल्लेबाज़ अधिक रन नही बना सका तो पंजाब ने गेंदबाज़ी तो शानदार की ही होगी.
कम स्कोर वाले मैच में एक समय तो हैदराबाद की हालत यह थी कि 10.4 ओवर के बाद उसका स्कोर दो विकेट खोकर केवल 56 रन था.
तब ऐसा लग रहा था कि हैदराबाद की यह धीमी रन गति कहीं हार का कारण ना बन जाए.
आखिरकार यह आशंका सच भी निकली.
हांलाकि हैदराबाद ने अंतिम 10 ओवर में 100 रन भी जोड़े और स्कोर को जैसे-तैसे चार विकेट पर 150 रन तक पहुंचाया.
मैच के बाद पंजाब के कप्तान आर अश्विन नें भी माना कि उनके गेंदबाज़ बाद में वार्नर और दूसरे बल्लेबाज़ों को नहीं रोक पाए लेकिन शुरू में मुजीब उर रहमान और अंकित राजपूत के अलावा सैम करेन ने शानदार गेंदबाज़ी की.
खैर जो भी हो इस मैच में पंजाब की जीत से सबसे अधिक खुशी अगर किसी खिलाड़ी को हुई तो वह केएल राहुल ही थे.
मैन ऑफ द मैच बने केएल राहुल ने 53 गेंदों पर सात चौके और एक छक्के की मदद से नाबाद 71 रन बनाए. उन्हें इस दौरान मंयक अग्रवाल का भी बेहतरीन साथ मिला.
शुरू में ही क्रिस गेल जब 16 रन बनाकर आउट हो गए तब पंजाब का स्कोर केवल 18 रन था.
उसके बाद मयंक अग्रवाल और केएल राहुल ने मिलकर दूसरे विकेट के लिए 114 रन जोड़कर हैदराबाद के हाथ से मैच खींच लिया.
मयंक अग्रवाल ने 43 गेंदों पर तीन चौके और तीन छक्कों की मदद से 55 रन बनाए.
वैसे मयंक अग्रवाल और केएल राहुल साल 2010 में न्यूज़ीलैंड में आयोजित हुए अंडर-19 विश्व कप क्रिकेट टूर्नामेंट में भी खेल चुके है.
हांलाकि तब भारत छठे स्थान पर रहा था लेकिन मयंक अग्रवाल अपने बल्ले से ख़ासे कामयाब रहे थे.
दरअसल केएल राहुल इसलिए खुश हुए होंगे क्योंकि अगर कहीं पंजाब इस मैच को भी हार जाता तो फिर केएल राहुल के लिए जवाब देना मुश्किल हो जाता.
दरअसल पिछले मैच में उन्होंने जिस सुस्त रफ़्तार से चेन्नई के ख़िलाफ़ 47 गेंदों पर 55 रन बनाए उसे पंजाब की हार का कारण माना गया.
चेन्नई के ख़िलाफ़ जीत के लिए 161 रनों की तलाश में पंजाब तीन विकेट खोकर 138 रन ही बना सकी और 22 रन से हार गई.
उनके साथ सरफ़राज़ खान भी आलोचना का शिकार बने. सरफ़राज़ खान ने भी सुस्त रफ़्तार से 59 गेंदों पर 67 रन बनाए थे.
दूसरी तरफ हैदराबाद के डेविड वार्नर और विजय शंकर की हालत अब बिलकुल केएल राहुल और सरफ़राज़ खान जैसी हो गई है.
इन दोनो के बीच दूसरे विकेट के लिए 49 रनों की साझेदारी ज़रूर हुई लेकिन जब विजय शंकर दूसरे विकेट के रूप में आउट हुए तब हैदराबाद का स्कोर 10.4 ओवर में केवल 56 रन था.
इससे पहले जॉनी बेयरस्टो दूसरे ओवर की चौथी गेंद पर केवल एक रन बनाकर मुजीब उर रहमान की गेंद पर आर अश्विन के हाथों कैच हुए थे.
शायद इसी लिए क्रिकेट को अनिश्तितता के साथ-साथ बेरहम खेल भी कहा जाता है.
किसी मैच का विलेन माने जाने वाला खिलाड़ी अगले ही मैच में हीरो बन जाता है तो कोई स्टार खिलाड़ी हार का कारण बन जाता है.
गेंद से छेड़छाड़ के मामले से मुक्त होकर वार्नर का बल्ला इससे पहले इस बार ख़ूब गरजा है.
वार्नर ने कोलकाता के ख़िलाफ़ 85, राजस्थान रॉयल्स के ख़िलाफ़ 69 और बैंग्लोर के ख़िलाफ़ नाबाद 100 रन बनाए.
वैसे वार्नर के साथ धीमी बल्लेबाज़ी करने वाले विजय शंकर ने कहा कि शुरू में पंजाब के गेंदबाज़ो को खेलना मुश्किल था. उन्होंने वार्नर के साथ मिलकर रणनीति बनाई कि विकेट बचाए जाए और बाद में तेज़ खेला जाए.
विजय शंकर 27 गेंद खेलकर 26 रन ही बना सके.
जो भी हो इस जीत से केएल राहुल की पिछले मैच की ग़लती सुधर गई और पंजाब छठे मैच में चौथी जीत हासिल करने में कामयाब रहा.
दूसरी तरफ सनराइजर्स हैदराबाद की छह मैचों में यह तीसरी हार रही.
कमाल का संयोग है वार्नर के 70 रनों से केवल एक रन की अधिक यानि नाबाद 71 रन की पारी ने केएल राहुल का पिछला दाग़ धो दिया.
इस ओवर में पंजाब को जीत के लिए 11 रन की ज़रूरत थी.
मैदान में सैम करेन और केएल राहुल थे. राहुल को चौथी गेंद पर स्ट्राइक मिली.
उन्होंने आखिरी ओवर कर रहे मोहम्मद नबी के ऊपर से ऊंचा शॉट खेलकर चौका लगाया, और उसके बाद अगली गेंद पर दो रन लेकर पंजाब को जीत दिला दी.
दूसरी तरफ सैम करेन भी नबी की शुरूआती तीन गेंदों पर पांच रन बना चुके थे.
इस मैच में पजांब के सामने जीत के लिए 151 रनों का लक्ष्य था जो उसने केएल राहुल के नाबाद 71 और मयंक अग्रवाल के 55 रनों की मदद से 19.5 ओवर में चार विकेट खोकर हासिल किया.
इससे पहले हैदराबाद ने टॉस हारकर पहले बल्लेबाज़ी करते हुए निर्धारित 20 ओवर में डेविड वार्नर के नाबाद 70 रन की मदद से चार विकेट खोकर 150 रन बनाए.
ज़ाहिर है कि जिस विकेट पर पारी की शुरूआत से अंतिम ओवर तक 62 गेंदों पर छह चौके और एक छक्के की मदद से नाबाद 70 रन बनाने वाले हैदराबाद के अलावा कोई और बल्लेबाज़ अधिक रन नही बना सका तो पंजाब ने गेंदबाज़ी तो शानदार की ही होगी.
कम स्कोर वाले मैच में एक समय तो हैदराबाद की हालत यह थी कि 10.4 ओवर के बाद उसका स्कोर दो विकेट खोकर केवल 56 रन था.
तब ऐसा लग रहा था कि हैदराबाद की यह धीमी रन गति कहीं हार का कारण ना बन जाए.
आखिरकार यह आशंका सच भी निकली.
हांलाकि हैदराबाद ने अंतिम 10 ओवर में 100 रन भी जोड़े और स्कोर को जैसे-तैसे चार विकेट पर 150 रन तक पहुंचाया.
मैच के बाद पंजाब के कप्तान आर अश्विन नें भी माना कि उनके गेंदबाज़ बाद में वार्नर और दूसरे बल्लेबाज़ों को नहीं रोक पाए लेकिन शुरू में मुजीब उर रहमान और अंकित राजपूत के अलावा सैम करेन ने शानदार गेंदबाज़ी की.
खैर जो भी हो इस मैच में पंजाब की जीत से सबसे अधिक खुशी अगर किसी खिलाड़ी को हुई तो वह केएल राहुल ही थे.
मैन ऑफ द मैच बने केएल राहुल ने 53 गेंदों पर सात चौके और एक छक्के की मदद से नाबाद 71 रन बनाए. उन्हें इस दौरान मंयक अग्रवाल का भी बेहतरीन साथ मिला.
शुरू में ही क्रिस गेल जब 16 रन बनाकर आउट हो गए तब पंजाब का स्कोर केवल 18 रन था.
उसके बाद मयंक अग्रवाल और केएल राहुल ने मिलकर दूसरे विकेट के लिए 114 रन जोड़कर हैदराबाद के हाथ से मैच खींच लिया.
मयंक अग्रवाल ने 43 गेंदों पर तीन चौके और तीन छक्कों की मदद से 55 रन बनाए.
वैसे मयंक अग्रवाल और केएल राहुल साल 2010 में न्यूज़ीलैंड में आयोजित हुए अंडर-19 विश्व कप क्रिकेट टूर्नामेंट में भी खेल चुके है.
हांलाकि तब भारत छठे स्थान पर रहा था लेकिन मयंक अग्रवाल अपने बल्ले से ख़ासे कामयाब रहे थे.
दरअसल केएल राहुल इसलिए खुश हुए होंगे क्योंकि अगर कहीं पंजाब इस मैच को भी हार जाता तो फिर केएल राहुल के लिए जवाब देना मुश्किल हो जाता.
दरअसल पिछले मैच में उन्होंने जिस सुस्त रफ़्तार से चेन्नई के ख़िलाफ़ 47 गेंदों पर 55 रन बनाए उसे पंजाब की हार का कारण माना गया.
चेन्नई के ख़िलाफ़ जीत के लिए 161 रनों की तलाश में पंजाब तीन विकेट खोकर 138 रन ही बना सकी और 22 रन से हार गई.
उनके साथ सरफ़राज़ खान भी आलोचना का शिकार बने. सरफ़राज़ खान ने भी सुस्त रफ़्तार से 59 गेंदों पर 67 रन बनाए थे.
दूसरी तरफ हैदराबाद के डेविड वार्नर और विजय शंकर की हालत अब बिलकुल केएल राहुल और सरफ़राज़ खान जैसी हो गई है.
इन दोनो के बीच दूसरे विकेट के लिए 49 रनों की साझेदारी ज़रूर हुई लेकिन जब विजय शंकर दूसरे विकेट के रूप में आउट हुए तब हैदराबाद का स्कोर 10.4 ओवर में केवल 56 रन था.
इससे पहले जॉनी बेयरस्टो दूसरे ओवर की चौथी गेंद पर केवल एक रन बनाकर मुजीब उर रहमान की गेंद पर आर अश्विन के हाथों कैच हुए थे.
शायद इसी लिए क्रिकेट को अनिश्तितता के साथ-साथ बेरहम खेल भी कहा जाता है.
किसी मैच का विलेन माने जाने वाला खिलाड़ी अगले ही मैच में हीरो बन जाता है तो कोई स्टार खिलाड़ी हार का कारण बन जाता है.
गेंद से छेड़छाड़ के मामले से मुक्त होकर वार्नर का बल्ला इससे पहले इस बार ख़ूब गरजा है.
वार्नर ने कोलकाता के ख़िलाफ़ 85, राजस्थान रॉयल्स के ख़िलाफ़ 69 और बैंग्लोर के ख़िलाफ़ नाबाद 100 रन बनाए.
वैसे वार्नर के साथ धीमी बल्लेबाज़ी करने वाले विजय शंकर ने कहा कि शुरू में पंजाब के गेंदबाज़ो को खेलना मुश्किल था. उन्होंने वार्नर के साथ मिलकर रणनीति बनाई कि विकेट बचाए जाए और बाद में तेज़ खेला जाए.
विजय शंकर 27 गेंद खेलकर 26 रन ही बना सके.
जो भी हो इस जीत से केएल राहुल की पिछले मैच की ग़लती सुधर गई और पंजाब छठे मैच में चौथी जीत हासिल करने में कामयाब रहा.
दूसरी तरफ सनराइजर्स हैदराबाद की छह मैचों में यह तीसरी हार रही.
कमाल का संयोग है वार्नर के 70 रनों से केवल एक रन की अधिक यानि नाबाद 71 रन की पारी ने केएल राहुल का पिछला दाग़ धो दिया.
पाकिस्तान में इस प्लेकार्ड पर क्यों मचा है हंगामा?
जब रुमिसा लखानी और रशीदा शब्बीर हुसैन ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर एक पोस्ट बनाया, उन्हें इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि ये उन्हें पाकिस्तान में तीखी बहस के केंद्र में ला देगा.
कार्यक्रम के एक दिन पहले 22 साल की दोनों छात्राओं ने कराची के अपने विश्वविद्यालय में पोस्टर बनाने की एक वर्कशॉप में हिस्सा लिया.
वो ऐसा पोस्टर बनाना चाहती थीं जो लोगों का ध्यान आकर्षत करे और उन्होंने अनोखे आइडिया पर सोचना शुरू किया.
उनकी दोस्त अपने दोनों पैरों को फैला कर बैठी थी और इसी से प्रेरित होकर रुमिसा और रशीदा ने एक पोस्टर बनाया.
महिलाएं किस तरह बैठें, ये रूमिसा के लिए एक मुद्दा रहा है. वो कहती हैं, "हमसे सौम्यता की अपेक्षा की जाती है, हमें इस बात की चिंता करनी पड़ती है कि हमारे शरीर का आकार न दिखे. पुरुष चाहे पैर फैला कर बैठें, किसी का ध्यान नहीं जाता. "
रुमिसा के पोस्टर में एक महिला पैर फैला कर बैठी हुई है और धूप के चश्मे के पीछे बेझिझक हंस रही है.
उनकी क़रीबी दोस्त रशीदा ने इसके लिए एक नारा दिया. रशीदा चाहती थीं कि लोगों का इस बात पर ध्यान जाए कि महिलाओं को ये बताया जाता है कि "उन्हें कैसे बठना चाहिए, कैसे चलना चाहिए, कैसे बात करनी चाहिए. "
इसलिए उन्होंने इसका शीर्षक दिया, "यहां, मैं बिल्कुल सही तरीके से बैठी हूं." हबीब यूनिवर्सिटी में अपने पहले साल में रुमिसा और रशीदा के बीच दोस्ती हुई थी. रुमिसा कम्युनिकेशन डिज़ाइन की जबकि रशीदा सोशल डेवलपमेंट एंड पॉलिसी की पढ़ाई करती हैं.
लैंगिक भेदभाव से जुड़े अपने निजी अनुभवों के आधार पर, वो महिला अधिकारों को लेकर अपने विचारों पर भी बातचीत करती हैं.
शादी करने के लगातार दबाव का सामना करना रुमिसा के लिए रोज़ का संघर्ष है. उन्हें लगता है कि अभी तक शादी न करना उनकी निजी जीत है.
रशीदा कहती हैं कि सड़कों पर वो लगातार उत्पीड़न झेलती हैं. शादी करके घर बसा लेने की उम्मीद उन्हें असहज बना देती है.
इसीलिए पिछले महीने पूरे पाकिस्तान में महिलाओं के लिए हुए मार्च 'औरत' में दोनों हिस्सा लेना चाहती थीं. रुमिसा कहती हैं कि अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठातीं अधिकांश महिलाओं के साथ होना एक बेहतरीन एहसास था.
देश के महिला अधिकार आंदोलनों में 'वुमेन मार्च' एक बड़ा आंदोलन था. इन प्रदर्शनों में बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हुईं, यहां तक की एलजीबीटी समुदाय के लोग भी थे.
वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम ने 2018 में पाकिस्तान को दुनिया के 149 देशों में लैंगिक समानता के मामले में बदतर रैंकिंग में बताया था.
पाकिस्तान में महिलाओं को घरेलू हिंसा, ज़बरन शादी, लैंगिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है. यहां तक कि वो ऑनर किलिंग का शिकार भी हो सकती हैं.
मार्च में कुछ प्लेकार्ड और पोस्टरों में लैंगिक मुद्दों को उठाया गया था और इस संकीर्ण समाज में इसने एक तीखी बहस शुरु कर दी.
मार्च के आयोजकों में से एक मोनीज़ा कहा कहना है, "हम महिलाओं की सेक्सुअलिटी को निर्धारित करने को चुनौती दे रहे थे. धार्मिक समाज में एक धारणा होती है कि महिलाओं को खुद को ढंक कर और घर में रहना चाहिए. हम इसे चुनौती दे रहे हैं."
वो कहती हैं, "सड़क पर ऊंची आवाज़ में ऐसा करना लोगों को असहज कर गया. लोगों को लगा कि ये इस्लाम के लिए ख़तरा है, हालांकि, हमें ऐसा नहीं लगता. मुझे लगता है कि इस्लाम स्त्रीवादी धर्म है."
प्रदर्शन से घर वापस आते वक्त ही रुमिसा को लग गया था कि प्लेकार्ड के साथ उनकी तस्वीर वायरल हो गई है.
फ़ेसबुक पर एक टिप्पणी थी, "अपनी बेटियों के लिए ऐसे समाज की मुझे ज़रूरत नहीं." जबकि एक दूसरी टिप्पणी में कहा गया था, "मैं एक महिला हूं लेकिन निश्चित रूप से ये मुझे अच्छा नहीं लगा. " एक और टिप्पणी में कहा गया, "ये महिला दिवस था, कुतिया दिवस नहीं."
हालांकि, बहुत से लोगों ने इस प्लेकार्ड का समर्थन भी किया.
एक महिला ने लिखा, "सही में मैं नहीं समझ पा रही हूं कि पोस्ट पर लिखे शब्दों से लोग क्यों डरे हुए हैं जबकि उन्हें पाकिस्तान में महिलाओं की गुलामी पर शर्म आनी चाहिए."
रुमिसा को उसके जानने वालों के संदेश मिले, "हमें भरोसा नहीं हो रहा कि तुमने ऐसा किया. तुम एक अच्छे परिवार से आती हो."
दूर के रिश्तेदारों ने रुमिसा के मां बाप से कहा कि उसे इस तरह के प्रदर्शनों में नहीं जाने देना चाहिए.
हालांकि, तमाम दबावों के बावजूद परिजनों ने रुमिसा का साथ दिया.
प्रदर्शन के दौरान एक और पोस्टर पर लिखा था, "मेरा शरीर, मेरा चुनाव." समा टीवी चैनल के अनुसार, कराची के एक मौलवी ने इसकी निंदा की.
कथित रूप से ऑनलाइन वीडियो में डॉ. मंज़ूर अहमद मेंगल ने कहा, "मेरा शरीर, मेरा चुनाव...आपका शरीर आपका चुनाव...तो फिर पुरुषों का शरीर पुरुषों का चुनाव ...वे जिस पर चाहें चढ़ सकते हैं." उन पर रेप के लिए उकसाने के आरोप लगे.
मोनीज़ा कहती हैं, "उस प्रदर्शन के बाद रेप और जान से मारने की धमकी आम हो गई है." वो कहती हैं, "सोशल मीडिया पर आलोचनाओं के साथ ही अधिकांश आयोजकों को रेप की धमकी मिली."
यहां तक कि इस प्रदर्शन ने देश के स्त्रीवादी आंदोलनों में भी दरार पैदा कर दी. सोशल मीडिया पर की गई आलोचनाओं में कई स्वयंभू स्त्रीवादियों ने भी हिस्सा लिया. उनका कहना था, "ये जायज़ मुद्दा नहीं है, महिलाएं इस तरह व्यवहार करें, ये कोई तरीका नहीं है."
रुमिसा कहती हैं, "मेरे अपने दोस्त, जो खुद को फ़ेमिनिस्ट कहते हैं, उन्हें लगा कि ये पोस्टर गैरज़रूरी था."
एक प्रमुख स्त्रीवादी किश्वर नहीद ने कहा कि उन्हें लगता है कि रुमिसा और रशीदा का प्लेकार्ड और उनकी तरह के और पोस्टर परम्परा और मूल्यों का अपमान थे.
उन्होंने कहा कि जो सोचते हैं कि इस तरह के पोस्टरों से वो और अधिकार हासिल कर लेंगे, वो दिग्भ्रमित जिहादी हैं, जो सोचते हैं कि निर्दोष लोगों की हत्या कर वे स्वर्ग चले जाएंगे.
हालांकि, अख़बार डॉन में सादिया खत्री ने एक लेख लिख कर किश्वर पर स्त्रीवादियों को बदनाम करने का आरोप लगाया.
विवादों के बावजूद रुमिसा को पोस्टर बनाने पर अफसोस नहीं है, "मुझे खुशी है कि मेरे पोस्टर ने बहुत सारे लोगों का ध्यान आकर्षित किया."
वो कहती हैं, "इससे मुझे शर्म या डर नहीं है, यही कारण है कि हमने उस तरह के नारे का इस्तेमाल किया क्योंकि हम चाहते थे कि महिला मार्च और इससे जुड़े मुद्दों पर लोगों का ध्यान जाए."
कार्यक्रम के एक दिन पहले 22 साल की दोनों छात्राओं ने कराची के अपने विश्वविद्यालय में पोस्टर बनाने की एक वर्कशॉप में हिस्सा लिया.
वो ऐसा पोस्टर बनाना चाहती थीं जो लोगों का ध्यान आकर्षत करे और उन्होंने अनोखे आइडिया पर सोचना शुरू किया.
उनकी दोस्त अपने दोनों पैरों को फैला कर बैठी थी और इसी से प्रेरित होकर रुमिसा और रशीदा ने एक पोस्टर बनाया.
महिलाएं किस तरह बैठें, ये रूमिसा के लिए एक मुद्दा रहा है. वो कहती हैं, "हमसे सौम्यता की अपेक्षा की जाती है, हमें इस बात की चिंता करनी पड़ती है कि हमारे शरीर का आकार न दिखे. पुरुष चाहे पैर फैला कर बैठें, किसी का ध्यान नहीं जाता. "
रुमिसा के पोस्टर में एक महिला पैर फैला कर बैठी हुई है और धूप के चश्मे के पीछे बेझिझक हंस रही है.
उनकी क़रीबी दोस्त रशीदा ने इसके लिए एक नारा दिया. रशीदा चाहती थीं कि लोगों का इस बात पर ध्यान जाए कि महिलाओं को ये बताया जाता है कि "उन्हें कैसे बठना चाहिए, कैसे चलना चाहिए, कैसे बात करनी चाहिए. "
इसलिए उन्होंने इसका शीर्षक दिया, "यहां, मैं बिल्कुल सही तरीके से बैठी हूं." हबीब यूनिवर्सिटी में अपने पहले साल में रुमिसा और रशीदा के बीच दोस्ती हुई थी. रुमिसा कम्युनिकेशन डिज़ाइन की जबकि रशीदा सोशल डेवलपमेंट एंड पॉलिसी की पढ़ाई करती हैं.
लैंगिक भेदभाव से जुड़े अपने निजी अनुभवों के आधार पर, वो महिला अधिकारों को लेकर अपने विचारों पर भी बातचीत करती हैं.
शादी करने के लगातार दबाव का सामना करना रुमिसा के लिए रोज़ का संघर्ष है. उन्हें लगता है कि अभी तक शादी न करना उनकी निजी जीत है.
रशीदा कहती हैं कि सड़कों पर वो लगातार उत्पीड़न झेलती हैं. शादी करके घर बसा लेने की उम्मीद उन्हें असहज बना देती है.
इसीलिए पिछले महीने पूरे पाकिस्तान में महिलाओं के लिए हुए मार्च 'औरत' में दोनों हिस्सा लेना चाहती थीं. रुमिसा कहती हैं कि अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठातीं अधिकांश महिलाओं के साथ होना एक बेहतरीन एहसास था.
देश के महिला अधिकार आंदोलनों में 'वुमेन मार्च' एक बड़ा आंदोलन था. इन प्रदर्शनों में बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हुईं, यहां तक की एलजीबीटी समुदाय के लोग भी थे.
वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम ने 2018 में पाकिस्तान को दुनिया के 149 देशों में लैंगिक समानता के मामले में बदतर रैंकिंग में बताया था.
पाकिस्तान में महिलाओं को घरेलू हिंसा, ज़बरन शादी, लैंगिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है. यहां तक कि वो ऑनर किलिंग का शिकार भी हो सकती हैं.
मार्च में कुछ प्लेकार्ड और पोस्टरों में लैंगिक मुद्दों को उठाया गया था और इस संकीर्ण समाज में इसने एक तीखी बहस शुरु कर दी.
मार्च के आयोजकों में से एक मोनीज़ा कहा कहना है, "हम महिलाओं की सेक्सुअलिटी को निर्धारित करने को चुनौती दे रहे थे. धार्मिक समाज में एक धारणा होती है कि महिलाओं को खुद को ढंक कर और घर में रहना चाहिए. हम इसे चुनौती दे रहे हैं."
वो कहती हैं, "सड़क पर ऊंची आवाज़ में ऐसा करना लोगों को असहज कर गया. लोगों को लगा कि ये इस्लाम के लिए ख़तरा है, हालांकि, हमें ऐसा नहीं लगता. मुझे लगता है कि इस्लाम स्त्रीवादी धर्म है."
प्रदर्शन से घर वापस आते वक्त ही रुमिसा को लग गया था कि प्लेकार्ड के साथ उनकी तस्वीर वायरल हो गई है.
फ़ेसबुक पर एक टिप्पणी थी, "अपनी बेटियों के लिए ऐसे समाज की मुझे ज़रूरत नहीं." जबकि एक दूसरी टिप्पणी में कहा गया था, "मैं एक महिला हूं लेकिन निश्चित रूप से ये मुझे अच्छा नहीं लगा. " एक और टिप्पणी में कहा गया, "ये महिला दिवस था, कुतिया दिवस नहीं."
हालांकि, बहुत से लोगों ने इस प्लेकार्ड का समर्थन भी किया.
एक महिला ने लिखा, "सही में मैं नहीं समझ पा रही हूं कि पोस्ट पर लिखे शब्दों से लोग क्यों डरे हुए हैं जबकि उन्हें पाकिस्तान में महिलाओं की गुलामी पर शर्म आनी चाहिए."
रुमिसा को उसके जानने वालों के संदेश मिले, "हमें भरोसा नहीं हो रहा कि तुमने ऐसा किया. तुम एक अच्छे परिवार से आती हो."
दूर के रिश्तेदारों ने रुमिसा के मां बाप से कहा कि उसे इस तरह के प्रदर्शनों में नहीं जाने देना चाहिए.
हालांकि, तमाम दबावों के बावजूद परिजनों ने रुमिसा का साथ दिया.
प्रदर्शन के दौरान एक और पोस्टर पर लिखा था, "मेरा शरीर, मेरा चुनाव." समा टीवी चैनल के अनुसार, कराची के एक मौलवी ने इसकी निंदा की.
कथित रूप से ऑनलाइन वीडियो में डॉ. मंज़ूर अहमद मेंगल ने कहा, "मेरा शरीर, मेरा चुनाव...आपका शरीर आपका चुनाव...तो फिर पुरुषों का शरीर पुरुषों का चुनाव ...वे जिस पर चाहें चढ़ सकते हैं." उन पर रेप के लिए उकसाने के आरोप लगे.
मोनीज़ा कहती हैं, "उस प्रदर्शन के बाद रेप और जान से मारने की धमकी आम हो गई है." वो कहती हैं, "सोशल मीडिया पर आलोचनाओं के साथ ही अधिकांश आयोजकों को रेप की धमकी मिली."
यहां तक कि इस प्रदर्शन ने देश के स्त्रीवादी आंदोलनों में भी दरार पैदा कर दी. सोशल मीडिया पर की गई आलोचनाओं में कई स्वयंभू स्त्रीवादियों ने भी हिस्सा लिया. उनका कहना था, "ये जायज़ मुद्दा नहीं है, महिलाएं इस तरह व्यवहार करें, ये कोई तरीका नहीं है."
रुमिसा कहती हैं, "मेरे अपने दोस्त, जो खुद को फ़ेमिनिस्ट कहते हैं, उन्हें लगा कि ये पोस्टर गैरज़रूरी था."
एक प्रमुख स्त्रीवादी किश्वर नहीद ने कहा कि उन्हें लगता है कि रुमिसा और रशीदा का प्लेकार्ड और उनकी तरह के और पोस्टर परम्परा और मूल्यों का अपमान थे.
उन्होंने कहा कि जो सोचते हैं कि इस तरह के पोस्टरों से वो और अधिकार हासिल कर लेंगे, वो दिग्भ्रमित जिहादी हैं, जो सोचते हैं कि निर्दोष लोगों की हत्या कर वे स्वर्ग चले जाएंगे.
हालांकि, अख़बार डॉन में सादिया खत्री ने एक लेख लिख कर किश्वर पर स्त्रीवादियों को बदनाम करने का आरोप लगाया.
विवादों के बावजूद रुमिसा को पोस्टर बनाने पर अफसोस नहीं है, "मुझे खुशी है कि मेरे पोस्टर ने बहुत सारे लोगों का ध्यान आकर्षित किया."
वो कहती हैं, "इससे मुझे शर्म या डर नहीं है, यही कारण है कि हमने उस तरह के नारे का इस्तेमाल किया क्योंकि हम चाहते थे कि महिला मार्च और इससे जुड़े मुद्दों पर लोगों का ध्यान जाए."
Sunday, March 31, 2019
चुनाव से आगे क्यों नहीं देख पाते नेता, क्या लोकतंत्र को नया करने की है ज़रूरत?
स्कॉटलैंड के दार्शनिक डेविड ह्यूम ने 1739 में लिखा था, "नागरिक सरकार की उत्पत्ति के मूल में यह है मनुष्य उस संकीर्णता को दूर करने में सक्षम नहीं है, जो उसे भविष्य के मुक़ाबले वर्तमान को पसंद करने के लिए तैयार करती है."
ह्यूम मानते थे कि सरकार के संस्थान- जैसे राजनीतिक प्रतिनिधि और संसदीय बहस हमारी आवेगी और स्वार्थी इच्छाओं को कम करेंगे और समाज के दीर्घकालिक हितों की पूर्ति करेंगे.
आज ह्यूम के विचार ख़याली पुलाव लगते हैं. हमारी राजनीतिक प्रणालियां हमें आगे की सोचने ही नहीं देतीं.
कई राजनेता अगले चुनाव से आगे देख नहीं पाते और नये जनमत सर्वेक्षण या नये ट्वीट की धुन पर ही नाचते रहते हैं.
सरकारें तुरंत समाधान चाहती हैं, जैसे अपराध के सामाजिक और आर्थिक कारणों की गहराई में जाकर उनका उपाय ढूंढ़ने की जगह अपराधियों को सलाखों के पीछे पहुंचा देना.
अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में जमा होने वाले देश भी निकट अवधि के मुद्दों और हितों पर ध्यान लगाते हैं, भले ही धरती गर्म होती रहे और प्रजातियां विलुप्त होती रहें.
जिस तरह चौबीसों घंटे चलने वाले समाचार माध्यम ब्रक्सिट वार्ता के नये मोड़ या अमरीकी राष्ट्रपति की किसी टिप्पणी पर चर्चा को घुमाते रहते हैं, उसी तरह आधुनिक लोकतांत्रिक राजनीति ज़्यादा दूर तक नहीं देख पा रही.
तो क्या वर्तमान में जीने वाली इस राजनीतिक प्रणाली को दुरुस्त करने का कोई उपाय है, जिसने भावी पीढ़ियों के हितों को स्थायी रूप से किनारे लगा दिया है?
यह दावा करना आम है कि आज वर्तमानवाद में सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल तकनीकों की वजह से है, जिसने राजनीतिक जीवन की गति को बढ़ा दिया है.
असल में वर्तमान के साथ चिपके रहने की जड़ें बहुत गहरी हैं. बार-बार होने वाले चुनाव राजनीतिक विमर्श को वर्तमान में समेट कर रखते हैं.
राजनेता अगले चुनाव में वोटरों को लुभाने के लिए टैक्स छूट की पेशकश करते हैं और दीर्घकालिक मुद्दों, जैसे पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान, पेंशन सुधार या बच्चों की शिक्षा में निवेश की अनदेखी कर देते हैं, क्योंकि उनसे उनको तुरंत राजनीतिक फ़ायदा नहीं होता.
1970 के दशक में अदूरदर्शी नीति-निर्माण को 'राजनीतिक व्यापार चक्र' कहा जाता था.
विशेष हित रखने वाले समूह, जैसे कॉरपोरेट निगम, राजनीतिक तंत्र का इस्तेमाल अपने निकट लाभों को सुरक्षित रखने के लिए करते हैं और लंबी अवधि की लागत को समाज के अन्य हिस्सों पर डाल देते हैं.
चुनाव अभियानों की फ़ंडिंग के ज़रिये हो या लॉबिंग में पैसे ख़र्च करके, बड़ी कंपनियां राजनीतिक तंत्र को हथिया लेती हैं. दुनिया भर में ऐसा हो रहा है. इससे दीर्घकालिक नीति निर्माण का एजेंडा नहीं बन पाता.
भावी नागरिकों को कोई अधिकार नहीं होते, न ही कल को प्रभावित करने वाले फ़ैसलों में उनकी चिंताओं या संभावित विचारों को रखने वाला कोई होता है.
लोकतांत्रिक प्रशासन में विशेषज्ञता रखने वाले राजनीतिक वैज्ञानिक के रूप में बिताए एक दशक के दौरान मुझे यह कभी नहीं लगा कि भावी पीढ़ियों को मताधिकार से उसी तरह वंचित किया गया है जैसी अतीत में ग़ुलामों या महिलाओं को किया गया था. लेकिन यह हक़ीक़त है.
इसीलिए स्वीडन के किशोर ग्रेटा थुनबर्ग से प्रेरित होकर दुनिया भर के लाखों स्कूली बच्चों ने अमीर देशों को कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए मनाने के लिए हड़ताल और मार्च किया.
लोकतांत्रिक प्रणालियों में उनकी आवाज़ को सुनने वाला कोई नहीं है और राजनीतिक परिदृश्य में उनके भविष्य के लिए कोई जगह नहीं है.
एक और कड़वी हक़ीक़त का सामना करने का समय आ गया है कि आधुनिक लोकतंत्र ने, ख़ासकर अमीर देशों में, हमें भविष्य को उपनिवेश बनाने में सक्षम बना दिया है.
हम भविष्य के साथ ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे वह दूर स्थित कोई उपनिवेश हो, जिस पर हम पारिस्थितिकी क्षरण, तकनीकी जोखिम, परमाणु कचरे और सार्वजनिक कर्ज़ का बोझ डालकर अपनी मर्ज़ी से उसका दोहन कर सकें.
ब्रिटेन ने 18वीं और 19वीं सदी में जब ऑस्ट्रेलिया को अपना उपनिवेश बनाया तब उसने एक क़ानूनी सिद्धांत का सहारा लिया था. उसे अब 'टेरा नलियस' कहा जाता है. इसका अर्थ है किसी की भूमि नहीं.
ब्रिटेन ने ऑस्ट्रेलिया के मूल वासियों के साथ ऐसा सलूक किया मानो उनका अस्तित्व ही न हो या वहां की ज़मीन पर उनका कोई दावा ही न हो.
आज हमारा व्यवहार 'टेंपस नलियस' की तरह है. भविष्य 'ख़ाली समय' या लावारिस इलाक़ा है जहां कोई बाशिंदा नहीं है. साम्राज्य के दूर के इलाक़ों की तरह यह हमारा है और इसका दोहन किया जा सकता है.
हमारे सामने चुनौती है कि लोकतंत्र को फिर से नया किया जाए ताकि वह वर्तमानवाद से उबर सके और भविष्य को उपनिवेश समझकर होने वाली भावी पीढ़ियों के संसाधनों की चोरी को रोका जा सके.
कुछ लोगों का कहना है कि लोकतंत्र बुनियादी रूप से अदूरदर्शी है और उदार तानाशाह मानवता के सामने आए कई संकटों पर दूरदृष्टि के साथ सोच सकते हैं.
ऐसा सोचने वालों में ब्रिटेन के मशहूर खगोलशास्त्री मार्टिन रीस भी हैं, जिन्होंने लिखा है कि जलवायु परिवर्तन और जैविक अस्त्रों के प्रसार जैसी दीर्घकालिक चुनौतियां से 21वीं सदी को सुरक्षित बनाने का रास्ता केवल एक प्रबुद्ध तानाशाह ही निकाल सकता है.
हाल में एक सार्वजनिक मंच पर जब मैंने उनसे पूछा कि क्या वर्तमानवाद से निपटने के लिए वह अधिनायकवाद का नुस्खा बता रहे हैं या क्या यह उनका मजाक था, तब उन्होंने कहा कि वास्तव में वह अर्ध-गंभीर थे.
रीस ने चीन का उदाहरण दिया जो वाम अधिनायकवादी शासन के कारण दीर्घकालिक नियोजन में सफल रहा. सौर ऊर्जा के क्षेत्र में भारी निवेश इसी का परिणाम है.
आश्चर्यजनक रूप से कई श्रोता रीस के समर्थन में सिर हिला रहे थे, हालांकि मैं उनमें नहीं था.
इतिहास में ऐसे उदाहरण कम ही मिलते हैं कि उदार तानाशाह लंबे समय तक प्रबुद्ध रहे हों. मिसाल के लिए, चीन के मानवाधिकारों के रिकॉर्ड देख लीजिए.
इस बात के भी सबूत नहीं हैं कि दीर्घकालिक सोच और नियोजन में अधिनायकवादी शासन का रिकॉर्ड लोकतांत्रिक शासन से बेहतर रहा हो.
स्वीडन में लोकतंत्र होने पर भी ज़रूरत की 60 फ़ीसदी बिजली नवीकरण ऊर्जा स्रोतों से बनती है, जबकि चीन में 26 फ़ीसदी बिजली ही ऐसे बनती है.
प्रतिनिधि लोकतंत्र को वर्तमान के प्रति इसके पूर्वाग्रहों से मुक्त करने के तरीक़े हो सकते हैं. वास्तव में, कई देशों ने भविष्य के नागरिकों को सशक्त बनाने के लिए प्रयोग शुरू कर दिए हैं.
ह्यूम मानते थे कि सरकार के संस्थान- जैसे राजनीतिक प्रतिनिधि और संसदीय बहस हमारी आवेगी और स्वार्थी इच्छाओं को कम करेंगे और समाज के दीर्घकालिक हितों की पूर्ति करेंगे.
आज ह्यूम के विचार ख़याली पुलाव लगते हैं. हमारी राजनीतिक प्रणालियां हमें आगे की सोचने ही नहीं देतीं.
कई राजनेता अगले चुनाव से आगे देख नहीं पाते और नये जनमत सर्वेक्षण या नये ट्वीट की धुन पर ही नाचते रहते हैं.
सरकारें तुरंत समाधान चाहती हैं, जैसे अपराध के सामाजिक और आर्थिक कारणों की गहराई में जाकर उनका उपाय ढूंढ़ने की जगह अपराधियों को सलाखों के पीछे पहुंचा देना.
अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में जमा होने वाले देश भी निकट अवधि के मुद्दों और हितों पर ध्यान लगाते हैं, भले ही धरती गर्म होती रहे और प्रजातियां विलुप्त होती रहें.
जिस तरह चौबीसों घंटे चलने वाले समाचार माध्यम ब्रक्सिट वार्ता के नये मोड़ या अमरीकी राष्ट्रपति की किसी टिप्पणी पर चर्चा को घुमाते रहते हैं, उसी तरह आधुनिक लोकतांत्रिक राजनीति ज़्यादा दूर तक नहीं देख पा रही.
तो क्या वर्तमान में जीने वाली इस राजनीतिक प्रणाली को दुरुस्त करने का कोई उपाय है, जिसने भावी पीढ़ियों के हितों को स्थायी रूप से किनारे लगा दिया है?
यह दावा करना आम है कि आज वर्तमानवाद में सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल तकनीकों की वजह से है, जिसने राजनीतिक जीवन की गति को बढ़ा दिया है.
असल में वर्तमान के साथ चिपके रहने की जड़ें बहुत गहरी हैं. बार-बार होने वाले चुनाव राजनीतिक विमर्श को वर्तमान में समेट कर रखते हैं.
राजनेता अगले चुनाव में वोटरों को लुभाने के लिए टैक्स छूट की पेशकश करते हैं और दीर्घकालिक मुद्दों, जैसे पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान, पेंशन सुधार या बच्चों की शिक्षा में निवेश की अनदेखी कर देते हैं, क्योंकि उनसे उनको तुरंत राजनीतिक फ़ायदा नहीं होता.
1970 के दशक में अदूरदर्शी नीति-निर्माण को 'राजनीतिक व्यापार चक्र' कहा जाता था.
विशेष हित रखने वाले समूह, जैसे कॉरपोरेट निगम, राजनीतिक तंत्र का इस्तेमाल अपने निकट लाभों को सुरक्षित रखने के लिए करते हैं और लंबी अवधि की लागत को समाज के अन्य हिस्सों पर डाल देते हैं.
चुनाव अभियानों की फ़ंडिंग के ज़रिये हो या लॉबिंग में पैसे ख़र्च करके, बड़ी कंपनियां राजनीतिक तंत्र को हथिया लेती हैं. दुनिया भर में ऐसा हो रहा है. इससे दीर्घकालिक नीति निर्माण का एजेंडा नहीं बन पाता.
भावी नागरिकों को कोई अधिकार नहीं होते, न ही कल को प्रभावित करने वाले फ़ैसलों में उनकी चिंताओं या संभावित विचारों को रखने वाला कोई होता है.
लोकतांत्रिक प्रशासन में विशेषज्ञता रखने वाले राजनीतिक वैज्ञानिक के रूप में बिताए एक दशक के दौरान मुझे यह कभी नहीं लगा कि भावी पीढ़ियों को मताधिकार से उसी तरह वंचित किया गया है जैसी अतीत में ग़ुलामों या महिलाओं को किया गया था. लेकिन यह हक़ीक़त है.
इसीलिए स्वीडन के किशोर ग्रेटा थुनबर्ग से प्रेरित होकर दुनिया भर के लाखों स्कूली बच्चों ने अमीर देशों को कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए मनाने के लिए हड़ताल और मार्च किया.
लोकतांत्रिक प्रणालियों में उनकी आवाज़ को सुनने वाला कोई नहीं है और राजनीतिक परिदृश्य में उनके भविष्य के लिए कोई जगह नहीं है.
एक और कड़वी हक़ीक़त का सामना करने का समय आ गया है कि आधुनिक लोकतंत्र ने, ख़ासकर अमीर देशों में, हमें भविष्य को उपनिवेश बनाने में सक्षम बना दिया है.
हम भविष्य के साथ ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे वह दूर स्थित कोई उपनिवेश हो, जिस पर हम पारिस्थितिकी क्षरण, तकनीकी जोखिम, परमाणु कचरे और सार्वजनिक कर्ज़ का बोझ डालकर अपनी मर्ज़ी से उसका दोहन कर सकें.
ब्रिटेन ने 18वीं और 19वीं सदी में जब ऑस्ट्रेलिया को अपना उपनिवेश बनाया तब उसने एक क़ानूनी सिद्धांत का सहारा लिया था. उसे अब 'टेरा नलियस' कहा जाता है. इसका अर्थ है किसी की भूमि नहीं.
ब्रिटेन ने ऑस्ट्रेलिया के मूल वासियों के साथ ऐसा सलूक किया मानो उनका अस्तित्व ही न हो या वहां की ज़मीन पर उनका कोई दावा ही न हो.
आज हमारा व्यवहार 'टेंपस नलियस' की तरह है. भविष्य 'ख़ाली समय' या लावारिस इलाक़ा है जहां कोई बाशिंदा नहीं है. साम्राज्य के दूर के इलाक़ों की तरह यह हमारा है और इसका दोहन किया जा सकता है.
हमारे सामने चुनौती है कि लोकतंत्र को फिर से नया किया जाए ताकि वह वर्तमानवाद से उबर सके और भविष्य को उपनिवेश समझकर होने वाली भावी पीढ़ियों के संसाधनों की चोरी को रोका जा सके.
कुछ लोगों का कहना है कि लोकतंत्र बुनियादी रूप से अदूरदर्शी है और उदार तानाशाह मानवता के सामने आए कई संकटों पर दूरदृष्टि के साथ सोच सकते हैं.
ऐसा सोचने वालों में ब्रिटेन के मशहूर खगोलशास्त्री मार्टिन रीस भी हैं, जिन्होंने लिखा है कि जलवायु परिवर्तन और जैविक अस्त्रों के प्रसार जैसी दीर्घकालिक चुनौतियां से 21वीं सदी को सुरक्षित बनाने का रास्ता केवल एक प्रबुद्ध तानाशाह ही निकाल सकता है.
हाल में एक सार्वजनिक मंच पर जब मैंने उनसे पूछा कि क्या वर्तमानवाद से निपटने के लिए वह अधिनायकवाद का नुस्खा बता रहे हैं या क्या यह उनका मजाक था, तब उन्होंने कहा कि वास्तव में वह अर्ध-गंभीर थे.
रीस ने चीन का उदाहरण दिया जो वाम अधिनायकवादी शासन के कारण दीर्घकालिक नियोजन में सफल रहा. सौर ऊर्जा के क्षेत्र में भारी निवेश इसी का परिणाम है.
आश्चर्यजनक रूप से कई श्रोता रीस के समर्थन में सिर हिला रहे थे, हालांकि मैं उनमें नहीं था.
इतिहास में ऐसे उदाहरण कम ही मिलते हैं कि उदार तानाशाह लंबे समय तक प्रबुद्ध रहे हों. मिसाल के लिए, चीन के मानवाधिकारों के रिकॉर्ड देख लीजिए.
इस बात के भी सबूत नहीं हैं कि दीर्घकालिक सोच और नियोजन में अधिनायकवादी शासन का रिकॉर्ड लोकतांत्रिक शासन से बेहतर रहा हो.
स्वीडन में लोकतंत्र होने पर भी ज़रूरत की 60 फ़ीसदी बिजली नवीकरण ऊर्जा स्रोतों से बनती है, जबकि चीन में 26 फ़ीसदी बिजली ही ऐसे बनती है.
प्रतिनिधि लोकतंत्र को वर्तमान के प्रति इसके पूर्वाग्रहों से मुक्त करने के तरीक़े हो सकते हैं. वास्तव में, कई देशों ने भविष्य के नागरिकों को सशक्त बनाने के लिए प्रयोग शुरू कर दिए हैं.
Tuesday, March 19, 2019
लोकसभा चुनाव 2019: घमंड में डूबी कांग्रेस आख़िर बीजेपी को ही जिता देगी- नज़रिया
ये पंक्ति कांग्रेस के उसके सहयोगी दलों के प्रति रवैये पर कुछ ज़्यादा ही फ़िट बैठती है.
मौजूदा वक़्त में कांग्रेस के सभी सहयोगी दल उस पर सहयोग न करने का आरोप लगा रहे हैं. उनका कहना है कि कांग्रेस का रवैया अभी इतना बुरा है कि लोकसभा चुनाव से पहले ये विपक्षी पार्टियों की एकता को कमज़ोर कर रहा है.
एक ओर जहां विपक्षी पार्टियां मिलकर बीजेपी को हराना चाहती हैं वहीं कहा ये जा रहा है कि इस मक़सद को हासिल करने में सबसे बड़ी चुनौती ख़ुद कांग्रेस पार्टी ही है.
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती और उनके सहयोगी अखिलेश यादव ने मंगलवार को कांग्रेस पर उत्तर प्रदेश में मतदाताओं के बीच 'भ्रम की स्थिति' फैलाने का आरोप लगाया.
उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा और राष्ट्रीय लोकदल ने गठबंधन कर लिया है. ये ऐसा गठबंधन नहीं है जिसे आसानी से तोड़ा जा सके. हालांकि सपा और बसपा उन क्षेत्रों में अपने भरोसेमंद प्रत्याशियों को उतारने में असफल रहे हैं जहां दोनों का अच्छा-ख़ासा वोट बैंक है.
कांग्रेस इस गठबंधन का हिस्सा नहीं है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि ये पूरी तरह से अलग-थलग है. कांग्रेस छोटी पार्टियों के साथ अपने अलग समीकरण बना रही है.
मिसाल के तौर पर देखें तो कांग्रेस की नई महासचिव प्रियंका गांधी ने अभी पिछले हफ़्ते ही भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर को 'करिश्माई नेता' बताया और इसके बाद ये ख़बर आई कि कांग्रेस, सपा और बसपा के पीठ पीछे चंद्रशेखर को वाराणसी से प्रधानमंत्री मोदी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ाने की तैयारी करा रही थी.
अब सपा और बसपा पूछ रही हैं कि कांग्रेस को ऐसा करने का अधिकार किसने दिया?
इसके बाद कांग्रेस ने ऐलान किया कि उत्तर प्रदेश में वो लोकसभा की कम से कम सात सीटों पर अपने उम्मीदवार नहीं उतारेगी, तो मायावती ने इसका तंज़ के साथ स्वागत किया.
"कांग्रेस उत्तर प्रदेश की सभी 80 लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने के लिए स्वतंत्र है. हमारा गठबंधन (सपा-बसपा-आरएलडी) बीजेपी को हराने का माद्दा रखता है. कांग्रेस को उत्तर प्रदेश के लोगों में ये भ्रम फैलाना छोड़ देना चाहिए कि वो सात सीटें हमारे गठबंधन के लिए छोड़ रही है."
बसपा देश के दूसरे राज्यों जैसे पंजाब, आंध्र प्रदेश और हरियाणा में भी ग़ैर-बीजेपी, ग़ैर-कांग्रेस दलों के साथ गठबंध की संभावनाएं तलाश रही है.
मायावती ने कहा, "बसपा एक बार फिर ये स्पष्ट करना चाहती है कि हमारा कांग्रेस के साथ न तो उत्तर प्रदेश में और न ही देश के किसी और हिस्से में कोई गठबंधन है. हमारे पार्टी कार्यकर्ताओं को कांग्रेस द्वारा लगभग रोज़-रोज़ फैलाए जा रहे भ्रमों से बचकर रहना चाहिए."
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भी एक ट्वीट में मायावती का समर्थन किया.
उन्होंने लिखा, "एसपी, बीएसपी और आरएलडी मिलकर बीजेपी को उत्तर प्रदेश में हराने में सक्षम हैं. कांग्रेस पार्टी को किसी तरह का भ्रम फैलाने की ज़रूरत नहीं है."
कांग्रेस ने जन-अधिकार पार्टी से गठबंधन करके अपना दल से अलग हुए धड़े के लिए दो सीटें छोड़ने का ऐलान किया है.
पर बात यहीं ख़त्म नहीं होती.
कांग्रेस ने बिहार के लिए भी नई महत्वाकांक्षा सजा ली हैं, जहां राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) ख़ुद को सबसे बड़ी पार्टी मानते हुए बीजेपी और जेडीयू को सत्ता में आने से रोकने की बात कर रही है.
बिहार में लोकसभा की 40 सीटों के लिए भी बहुत से दावेदार हैं. वहीं, आरजेडी 2014 के मुक़ाबले कम सीटों पर लड़ रही है.
कांग्रेस की अपनी अलग समस्याएं हैं. क्या उसे विपक्ष की एकता के लिए अपना अस्तित्व कमज़ोर करना चाहिए? ये सवाल कांग्रेस के कई बड़े नेताओं के मन में है.
उम्मीद की जा रही है कि पार्टी उत्तर प्रदेश की 70 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी लेकिन उसका ध्यान उन 25 सीटों पर ज़्यादा होगा जहां उसके उम्मीदवारों की जीतने की संभावना सबसे ज़्यादा है.
इसे एक तरफ़ तो कांग्रेस का झंडा बुलंद करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है लेकिन दूसरी तरफ़ उसके 'सहयोगी दल' इसे विपक्षी दलों की एकता में सेंध लगाने के क़दम के तौर पर देख रहे हैं:एक ऐसा क़दम, जो सिर्फ़ बीजेपी को फ़ायदा पहुंचाएगा.
जिन सीटों के लिए कांग्रेस ने उम्मीदवार न उतारने का फ़ैसला किया है वो हैं- मैनपुरी (मुलायम सिंह यादव का गढ़), कन्नौज (यहां से डिंपल यादव चुनाव लड़ सकती हैं) और फ़िरोज़ाबाद.
अगर मायावती चुनाव लड़ती हैं तो ये साफ़ है कि कांग्रेस न तो उनके ख़िलाफ़ कोई उम्मीदवार खड़ा करेगी और न ही आरएलडी प्रमुख अजित सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी के ख़िलाफ़.
यही दिक़्क़तें पश्चिम बंगाल में वामदलों के साथ होने वाली हैं.
ममता बनर्जी के साथ तो कोई गठबंधन की बात भी नहीं कर रहा है. कांग्रेस का दावा है कि ममता ने उन्हें विपक्षी पार्टियों की रैली में शामिल होने तक के लिए नहीं बुलाया लेकिन ममता इससे इनकार कर रही हैं.
मौजूदा वक़्त में कांग्रेस के सभी सहयोगी दल उस पर सहयोग न करने का आरोप लगा रहे हैं. उनका कहना है कि कांग्रेस का रवैया अभी इतना बुरा है कि लोकसभा चुनाव से पहले ये विपक्षी पार्टियों की एकता को कमज़ोर कर रहा है.
एक ओर जहां विपक्षी पार्टियां मिलकर बीजेपी को हराना चाहती हैं वहीं कहा ये जा रहा है कि इस मक़सद को हासिल करने में सबसे बड़ी चुनौती ख़ुद कांग्रेस पार्टी ही है.
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती और उनके सहयोगी अखिलेश यादव ने मंगलवार को कांग्रेस पर उत्तर प्रदेश में मतदाताओं के बीच 'भ्रम की स्थिति' फैलाने का आरोप लगाया.
उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा और राष्ट्रीय लोकदल ने गठबंधन कर लिया है. ये ऐसा गठबंधन नहीं है जिसे आसानी से तोड़ा जा सके. हालांकि सपा और बसपा उन क्षेत्रों में अपने भरोसेमंद प्रत्याशियों को उतारने में असफल रहे हैं जहां दोनों का अच्छा-ख़ासा वोट बैंक है.
कांग्रेस इस गठबंधन का हिस्सा नहीं है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि ये पूरी तरह से अलग-थलग है. कांग्रेस छोटी पार्टियों के साथ अपने अलग समीकरण बना रही है.
मिसाल के तौर पर देखें तो कांग्रेस की नई महासचिव प्रियंका गांधी ने अभी पिछले हफ़्ते ही भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर को 'करिश्माई नेता' बताया और इसके बाद ये ख़बर आई कि कांग्रेस, सपा और बसपा के पीठ पीछे चंद्रशेखर को वाराणसी से प्रधानमंत्री मोदी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ाने की तैयारी करा रही थी.
अब सपा और बसपा पूछ रही हैं कि कांग्रेस को ऐसा करने का अधिकार किसने दिया?
इसके बाद कांग्रेस ने ऐलान किया कि उत्तर प्रदेश में वो लोकसभा की कम से कम सात सीटों पर अपने उम्मीदवार नहीं उतारेगी, तो मायावती ने इसका तंज़ के साथ स्वागत किया.
"कांग्रेस उत्तर प्रदेश की सभी 80 लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने के लिए स्वतंत्र है. हमारा गठबंधन (सपा-बसपा-आरएलडी) बीजेपी को हराने का माद्दा रखता है. कांग्रेस को उत्तर प्रदेश के लोगों में ये भ्रम फैलाना छोड़ देना चाहिए कि वो सात सीटें हमारे गठबंधन के लिए छोड़ रही है."
बसपा देश के दूसरे राज्यों जैसे पंजाब, आंध्र प्रदेश और हरियाणा में भी ग़ैर-बीजेपी, ग़ैर-कांग्रेस दलों के साथ गठबंध की संभावनाएं तलाश रही है.
मायावती ने कहा, "बसपा एक बार फिर ये स्पष्ट करना चाहती है कि हमारा कांग्रेस के साथ न तो उत्तर प्रदेश में और न ही देश के किसी और हिस्से में कोई गठबंधन है. हमारे पार्टी कार्यकर्ताओं को कांग्रेस द्वारा लगभग रोज़-रोज़ फैलाए जा रहे भ्रमों से बचकर रहना चाहिए."
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भी एक ट्वीट में मायावती का समर्थन किया.
उन्होंने लिखा, "एसपी, बीएसपी और आरएलडी मिलकर बीजेपी को उत्तर प्रदेश में हराने में सक्षम हैं. कांग्रेस पार्टी को किसी तरह का भ्रम फैलाने की ज़रूरत नहीं है."
कांग्रेस ने जन-अधिकार पार्टी से गठबंधन करके अपना दल से अलग हुए धड़े के लिए दो सीटें छोड़ने का ऐलान किया है.
पर बात यहीं ख़त्म नहीं होती.
कांग्रेस ने बिहार के लिए भी नई महत्वाकांक्षा सजा ली हैं, जहां राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) ख़ुद को सबसे बड़ी पार्टी मानते हुए बीजेपी और जेडीयू को सत्ता में आने से रोकने की बात कर रही है.
बिहार में लोकसभा की 40 सीटों के लिए भी बहुत से दावेदार हैं. वहीं, आरजेडी 2014 के मुक़ाबले कम सीटों पर लड़ रही है.
कांग्रेस की अपनी अलग समस्याएं हैं. क्या उसे विपक्ष की एकता के लिए अपना अस्तित्व कमज़ोर करना चाहिए? ये सवाल कांग्रेस के कई बड़े नेताओं के मन में है.
उम्मीद की जा रही है कि पार्टी उत्तर प्रदेश की 70 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी लेकिन उसका ध्यान उन 25 सीटों पर ज़्यादा होगा जहां उसके उम्मीदवारों की जीतने की संभावना सबसे ज़्यादा है.
इसे एक तरफ़ तो कांग्रेस का झंडा बुलंद करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है लेकिन दूसरी तरफ़ उसके 'सहयोगी दल' इसे विपक्षी दलों की एकता में सेंध लगाने के क़दम के तौर पर देख रहे हैं:एक ऐसा क़दम, जो सिर्फ़ बीजेपी को फ़ायदा पहुंचाएगा.
जिन सीटों के लिए कांग्रेस ने उम्मीदवार न उतारने का फ़ैसला किया है वो हैं- मैनपुरी (मुलायम सिंह यादव का गढ़), कन्नौज (यहां से डिंपल यादव चुनाव लड़ सकती हैं) और फ़िरोज़ाबाद.
अगर मायावती चुनाव लड़ती हैं तो ये साफ़ है कि कांग्रेस न तो उनके ख़िलाफ़ कोई उम्मीदवार खड़ा करेगी और न ही आरएलडी प्रमुख अजित सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी के ख़िलाफ़.
यही दिक़्क़तें पश्चिम बंगाल में वामदलों के साथ होने वाली हैं.
ममता बनर्जी के साथ तो कोई गठबंधन की बात भी नहीं कर रहा है. कांग्रेस का दावा है कि ममता ने उन्हें विपक्षी पार्टियों की रैली में शामिल होने तक के लिए नहीं बुलाया लेकिन ममता इससे इनकार कर रही हैं.
Tuesday, March 12, 2019
波音737遭大规模停飞后 美国坚称出事机型“适航”
周日(3月10日)埃塞俄比亚航空公司一架波音737 MAX8客机在飞往肯尼亚途中坠毁, 机上149名乘客和8名机组成员全员遇难,其中包括8名中国乘客。中国和其它国家禁飞该机型。但美国官方称该机型可以继续执飞。
这是半年内第二架该型号的波音客机坠毁。中国民航局周一(3月11日)通知暂停中国波音737-8(即波音737 MAX8)的商业运营。但美国联邦航空管理局(FAA)表示波音该机型可以安全飞行。
哪些航空公司和国家已经停飞737 MAX8?
国际社会对此机型持审慎态度,新加坡民航局周二(3月12日)进一步禁止所有波音737 Max机型进出该国。阿根廷航空、墨西哥航空和巴西高尔航空也暂停了飞机的飞行。印尼、埃塞俄比亚也在3月11日要求停飞该机型。
与此同时,美国联邦航空管理局周一(3月11日)晚间发布通知称,该机型“持续适航”,可以安全飞行。
美国运输部长赵小兰(Elaine Chao)表示,如果飞机有缺陷,美国联邦航空局将“立即采取适当行动”。
美国联邦航空管理局局长丹·埃尔韦尔(Dan Elwell) 说,该局的声明“告知国际社会我们现在的进度,给国际社会一个答案。”
非盈利性航空消费者组织FlyersRights.org总裁兼美国联邦航空管理局航空规则制定咨询委员会成员保罗·哈德森(Paul Hudson)呼吁将此机型停飞。哈德森周一(3月11日)在一份声明中说:“美国联邦航空局的'观望'态度会影响美国航空业的生命和安全声誉。”
波音737 Max系列机型是波音史上销售最快的飞机,全球100多家航空公司订购了超过4500架飞机。
根据中国民航资源网统计,目前中国的航空公司共有96架波音737 MAX 8飞机,包括,中国南方航空有24架、中国国航有15架、海南航空有11架、上海航空有11架、厦门航空有10架、山东航空7架、深圳航空5架、东方航空和祥鹏航空各有3架、奥凯航空和福州航空及昆明航空各有2架,九元航空有1架。
波音公司是全球航空市场上美国最大的飞机出口商。三成左右的美国造737喷气式飞机被卖往中国。而中国有望在未来十年超越美国,成世界最大的航空市场。波音预测未来二十年,中国将需要7700架新飞机,价值1200亿美元。
下一步会发生什么?
事故调查将由埃塞俄比亚当局与波音公司和美国国家运输安全委员会的专家小组协调完成。
作为“安全预防措施”,在接到下一步通知前,埃塞俄比亚航空公司表示已停飞旗下所有波音737 Max8机型。
这是半年内第二架该型号的波音客机坠毁。中国民航局周一(3月11日)通知暂停中国波音737-8(即波音737 MAX8)的商业运营。但美国联邦航空管理局(FAA)表示波音该机型可以安全飞行。
哪些航空公司和国家已经停飞737 MAX8?
国际社会对此机型持审慎态度,新加坡民航局周二(3月12日)进一步禁止所有波音737 Max机型进出该国。阿根廷航空、墨西哥航空和巴西高尔航空也暂停了飞机的飞行。印尼、埃塞俄比亚也在3月11日要求停飞该机型。
与此同时,美国联邦航空管理局周一(3月11日)晚间发布通知称,该机型“持续适航”,可以安全飞行。
美国运输部长赵小兰(Elaine Chao)表示,如果飞机有缺陷,美国联邦航空局将“立即采取适当行动”。
美国联邦航空管理局局长丹·埃尔韦尔(Dan Elwell) 说,该局的声明“告知国际社会我们现在的进度,给国际社会一个答案。”
非盈利性航空消费者组织FlyersRights.org总裁兼美国联邦航空管理局航空规则制定咨询委员会成员保罗·哈德森(Paul Hudson)呼吁将此机型停飞。哈德森周一(3月11日)在一份声明中说:“美国联邦航空局的'观望'态度会影响美国航空业的生命和安全声誉。”
波音737 Max系列机型是波音史上销售最快的飞机,全球100多家航空公司订购了超过4500架飞机。
根据中国民航资源网统计,目前中国的航空公司共有96架波音737 MAX 8飞机,包括,中国南方航空有24架、中国国航有15架、海南航空有11架、上海航空有11架、厦门航空有10架、山东航空7架、深圳航空5架、东方航空和祥鹏航空各有3架、奥凯航空和福州航空及昆明航空各有2架,九元航空有1架。
波音公司是全球航空市场上美国最大的飞机出口商。三成左右的美国造737喷气式飞机被卖往中国。而中国有望在未来十年超越美国,成世界最大的航空市场。波音预测未来二十年,中国将需要7700架新飞机,价值1200亿美元。
下一步会发生什么?
事故调查将由埃塞俄比亚当局与波音公司和美国国家运输安全委员会的专家小组协调完成。
作为“安全预防措施”,在接到下一步通知前,埃塞俄比亚航空公司表示已停飞旗下所有波音737 Max8机型。
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