स्कॉटलैंड के दार्शनिक डेविड ह्यूम ने 1739 में लिखा था, "नागरिक सरकार की उत्पत्ति के मूल में यह है मनुष्य उस संकीर्णता को दूर करने में सक्षम नहीं है, जो उसे भविष्य के मुक़ाबले वर्तमान को पसंद करने के लिए तैयार करती है."
ह्यूम मानते थे कि सरकार के संस्थान- जैसे राजनीतिक प्रतिनिधि और संसदीय बहस हमारी आवेगी और स्वार्थी इच्छाओं को कम करेंगे और समाज के दीर्घकालिक हितों की पूर्ति करेंगे.
आज ह्यूम के विचार ख़याली पुलाव लगते हैं. हमारी राजनीतिक प्रणालियां हमें आगे की सोचने ही नहीं देतीं.
कई राजनेता अगले चुनाव से आगे देख नहीं पाते और नये जनमत सर्वेक्षण या नये ट्वीट की धुन पर ही नाचते रहते हैं.
सरकारें तुरंत समाधान चाहती हैं, जैसे अपराध के सामाजिक और आर्थिक कारणों की गहराई में जाकर उनका उपाय ढूंढ़ने की जगह अपराधियों को सलाखों के पीछे पहुंचा देना.
अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में जमा होने वाले देश भी निकट अवधि के मुद्दों और हितों पर ध्यान लगाते हैं, भले ही धरती गर्म होती रहे और प्रजातियां विलुप्त होती रहें.
जिस तरह चौबीसों घंटे चलने वाले समाचार माध्यम ब्रक्सिट वार्ता के नये मोड़ या अमरीकी राष्ट्रपति की किसी टिप्पणी पर चर्चा को घुमाते रहते हैं, उसी तरह आधुनिक लोकतांत्रिक राजनीति ज़्यादा दूर तक नहीं देख पा रही.
तो क्या वर्तमान में जीने वाली इस राजनीतिक प्रणाली को दुरुस्त करने का कोई उपाय है, जिसने भावी पीढ़ियों के हितों को स्थायी रूप से किनारे लगा दिया है?
यह दावा करना आम है कि आज वर्तमानवाद में सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल तकनीकों की वजह से है, जिसने राजनीतिक जीवन की गति को बढ़ा दिया है.
असल में वर्तमान के साथ चिपके रहने की जड़ें बहुत गहरी हैं. बार-बार होने वाले चुनाव राजनीतिक विमर्श को वर्तमान में समेट कर रखते हैं.
राजनेता अगले चुनाव में वोटरों को लुभाने के लिए टैक्स छूट की पेशकश करते हैं और दीर्घकालिक मुद्दों, जैसे पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान, पेंशन सुधार या बच्चों की शिक्षा में निवेश की अनदेखी कर देते हैं, क्योंकि उनसे उनको तुरंत राजनीतिक फ़ायदा नहीं होता.
1970 के दशक में अदूरदर्शी नीति-निर्माण को 'राजनीतिक व्यापार चक्र' कहा जाता था.
विशेष हित रखने वाले समूह, जैसे कॉरपोरेट निगम, राजनीतिक तंत्र का इस्तेमाल अपने निकट लाभों को सुरक्षित रखने के लिए करते हैं और लंबी अवधि की लागत को समाज के अन्य हिस्सों पर डाल देते हैं.
चुनाव अभियानों की फ़ंडिंग के ज़रिये हो या लॉबिंग में पैसे ख़र्च करके, बड़ी कंपनियां राजनीतिक तंत्र को हथिया लेती हैं. दुनिया भर में ऐसा हो रहा है. इससे दीर्घकालिक नीति निर्माण का एजेंडा नहीं बन पाता.
भावी नागरिकों को कोई अधिकार नहीं होते, न ही कल को प्रभावित करने वाले फ़ैसलों में उनकी चिंताओं या संभावित विचारों को रखने वाला कोई होता है.
लोकतांत्रिक प्रशासन में विशेषज्ञता रखने वाले राजनीतिक वैज्ञानिक के रूप में बिताए एक दशक के दौरान मुझे यह कभी नहीं लगा कि भावी पीढ़ियों को मताधिकार से उसी तरह वंचित किया गया है जैसी अतीत में ग़ुलामों या महिलाओं को किया गया था. लेकिन यह हक़ीक़त है.
इसीलिए स्वीडन के किशोर ग्रेटा थुनबर्ग से प्रेरित होकर दुनिया भर के लाखों स्कूली बच्चों ने अमीर देशों को कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए मनाने के लिए हड़ताल और मार्च किया.
लोकतांत्रिक प्रणालियों में उनकी आवाज़ को सुनने वाला कोई नहीं है और राजनीतिक परिदृश्य में उनके भविष्य के लिए कोई जगह नहीं है.
एक और कड़वी हक़ीक़त का सामना करने का समय आ गया है कि आधुनिक लोकतंत्र ने, ख़ासकर अमीर देशों में, हमें भविष्य को उपनिवेश बनाने में सक्षम बना दिया है.
हम भविष्य के साथ ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे वह दूर स्थित कोई उपनिवेश हो, जिस पर हम पारिस्थितिकी क्षरण, तकनीकी जोखिम, परमाणु कचरे और सार्वजनिक कर्ज़ का बोझ डालकर अपनी मर्ज़ी से उसका दोहन कर सकें.
ब्रिटेन ने 18वीं और 19वीं सदी में जब ऑस्ट्रेलिया को अपना उपनिवेश बनाया तब उसने एक क़ानूनी सिद्धांत का सहारा लिया था. उसे अब 'टेरा नलियस' कहा जाता है. इसका अर्थ है किसी की भूमि नहीं.
ब्रिटेन ने ऑस्ट्रेलिया के मूल वासियों के साथ ऐसा सलूक किया मानो उनका अस्तित्व ही न हो या वहां की ज़मीन पर उनका कोई दावा ही न हो.
आज हमारा व्यवहार 'टेंपस नलियस' की तरह है. भविष्य 'ख़ाली समय' या लावारिस इलाक़ा है जहां कोई बाशिंदा नहीं है. साम्राज्य के दूर के इलाक़ों की तरह यह हमारा है और इसका दोहन किया जा सकता है.
हमारे सामने चुनौती है कि लोकतंत्र को फिर से नया किया जाए ताकि वह वर्तमानवाद से उबर सके और भविष्य को उपनिवेश समझकर होने वाली भावी पीढ़ियों के संसाधनों की चोरी को रोका जा सके.
कुछ लोगों का कहना है कि लोकतंत्र बुनियादी रूप से अदूरदर्शी है और उदार तानाशाह मानवता के सामने आए कई संकटों पर दूरदृष्टि के साथ सोच सकते हैं.
ऐसा सोचने वालों में ब्रिटेन के मशहूर खगोलशास्त्री मार्टिन रीस भी हैं, जिन्होंने लिखा है कि जलवायु परिवर्तन और जैविक अस्त्रों के प्रसार जैसी दीर्घकालिक चुनौतियां से 21वीं सदी को सुरक्षित बनाने का रास्ता केवल एक प्रबुद्ध तानाशाह ही निकाल सकता है.
हाल में एक सार्वजनिक मंच पर जब मैंने उनसे पूछा कि क्या वर्तमानवाद से निपटने के लिए वह अधिनायकवाद का नुस्खा बता रहे हैं या क्या यह उनका मजाक था, तब उन्होंने कहा कि वास्तव में वह अर्ध-गंभीर थे.
रीस ने चीन का उदाहरण दिया जो वाम अधिनायकवादी शासन के कारण दीर्घकालिक नियोजन में सफल रहा. सौर ऊर्जा के क्षेत्र में भारी निवेश इसी का परिणाम है.
आश्चर्यजनक रूप से कई श्रोता रीस के समर्थन में सिर हिला रहे थे, हालांकि मैं उनमें नहीं था.
इतिहास में ऐसे उदाहरण कम ही मिलते हैं कि उदार तानाशाह लंबे समय तक प्रबुद्ध रहे हों. मिसाल के लिए, चीन के मानवाधिकारों के रिकॉर्ड देख लीजिए.
इस बात के भी सबूत नहीं हैं कि दीर्घकालिक सोच और नियोजन में अधिनायकवादी शासन का रिकॉर्ड लोकतांत्रिक शासन से बेहतर रहा हो.
स्वीडन में लोकतंत्र होने पर भी ज़रूरत की 60 फ़ीसदी बिजली नवीकरण ऊर्जा स्रोतों से बनती है, जबकि चीन में 26 फ़ीसदी बिजली ही ऐसे बनती है.
प्रतिनिधि लोकतंत्र को वर्तमान के प्रति इसके पूर्वाग्रहों से मुक्त करने के तरीक़े हो सकते हैं. वास्तव में, कई देशों ने भविष्य के नागरिकों को सशक्त बनाने के लिए प्रयोग शुरू कर दिए हैं.
No comments:
Post a Comment