Monday, December 31, 2018

नए साल से पहले की शायराना शाम और क़िस्से 'जोश' के

नववर्ष की पूर्व संध्या, उर्दू शायर जोश मलीहाबादी के संग, यानी सोने में सुगंध, ज़िंदगी भर याद रहनेवाली एक शाम.

वो साल 1967 का अंतिम दिन था. शब्बीर हुसैन ख़ान उर्फ़ जोश मलीहाबादी के साथ शायरों का एक समूह दिल्ली की जामा मस्जिद के निकट दरियागंज में मशहूर मोती महल रेस्त्रां में घुसा.

पाकिस्तान से दिल्ली पहुंचने के बाद, जोश इसी इलाक़े में जगत सिनेमा के पास एक होटल में ठहरे थे (कुछ सालों तक इस लेखक का भी निवास यहीं था).

पत्नी के दबाव में जोश लाहौर जाकर बस गए थे, जिसका उनके क़रीबी मित्र और भारत के उस समय प्रधानमंत्री रहे जवाहरलाल नेहरू को काफ़ी अफ़सोस रहा. उस रोज़ उन्होंने क़रीब घंटा भर उस रेस्त्रां में बिताया.

रेस्त्रां के बाद उन्हें किसी ज़रूरी काम से जाना था. लेकिन रेस्त्रां में बिताया वो घंटा अनमोल था. शाम की शुरुआत हुई आगरा के सहबा की ग़ज़लों के साथ, जिसमें विभाजन-पूर्व सालों की यादें शुमार थीं.

फिर बारी आई अफ़ज़ल साहब की, जिनपर दिल्ली में जोश साहब की मेज़बानी का ज़िम्मा था. उनकी नज़्मों की प्रेम और दीवानगी में स्त्री को ईश्वरत्व के साथ जोड़ा गया था. ये अवधारणा इन पंक्तियों में बिलकुल सटीक बैठती है, "मैंने तो औरत को ख़ुदा माना है".

पास कुर्सी पर बैठी एक महिला उन्हें कुछ यूं टकटकी बांधे देखती रही मानो उन अल्फ़ाज़ों के गूढ़ अर्थ तलाश रही हो. जयपुर के एक शायर बेताब ने गद्य में अपनी भावनाओं को उकेरा, जिसका अर्थ था कि उर्दू कविताओं में शराब, महिला और गीत साथ नहीं चल सकते, क्योंकि बातें इनसे इतर भी होती हैं.

जोश उनसे इत्तिफ़ाक़ दिखा रहे थे, क्योंकि अब तक वो ख़ुद भी बुलबुल, बयाबान, हुस्न ओ इश्क़ से दूरी बना चुके थे.

जब जवां हुई महफ़िल
लम्बोतरे चेहरे और ऊंची तरन्नुम वाले युवा सिकंदर देहलवी ने अपना सूफ़ियाना कलाम पढ़ा. उन्हें हर रोज मग़रीब की नमाज़ के बाद हरे भरे, सर्मद और हज़रत कलीमुल्लाह के मज़ारों पर अपने गढ़े हुए कलाम पढ़ते देखा जा सकता था. लेकिन उनके कलाम पर कम ही लोगों का ध्यान जाता, क्योंकि लोगों की दिलचस्पी रात 8 बजे के बाद होने वाली क़व्वालियों पर ज़्यादा रहती थी.

मशहूर कश्मीरी उर्दू शायर गुलज़ार देहलवी उस रोज़ नहीं थे, लेकिन आरईआई कॉलेज, दयालबाग़ के प्रोफ़ेसर मदहोश साहिब, मैकश अकबराबादी के साथ मौजूद थे. मदहोश जब वहां पहुंचे तो उनपर मदहोशी का आलम छा चुका था, लेकिन उनकी शायरी में कहीं मद का सुरूर न था.

मैकश अकबराबादी ने अपने नाम के ठीक विपरीत अपनी ज़िंदगी में कभी शराब नहीं चखी थी. वो ईश्वरीय-प्रेम में डूबे रहते और उनकी शायरी उनके सूफ़ियाना विचारों का अक्स होती थी. उनके हिसाब से पीर भी मैकश था, जिसके अनगिनत शागिर्द थे.

उन शागिर्दों में मोवा कतरा की नर्तकियां भी शुमार थीं, जो हर सुबह अपने बच्चों के साथ उनके पास आतीं और बुरी नज़र से बचाने के लिए उनसे तावीज़ बंधवातीं.

जोश के छोटे भाई शायर तो न थे, पर एक साहित्यकार और ज़मींदार थे, जो लखनऊ के पास मलीहाबाद से ख़ासतौर से अपने भाई और भाभी से मिलने आए थे.

जोश ने उनसे लाहौर में बोने के लिए दशहरी आम के कुछ बिरवे मंगाए थे. अपने आमों के लिए मलीहाबाद आज भी मशहूर है.

हर कोई उन्हें "ख़ान साहब" कहकर पुकारता था. पूरी शाम वो खोए-खोए और होटल में छोड़ आए अपने हुक़्क़े की याद में डूबे रहे. लेकिन रहरहकर किसी शायर की ज़ुबान से निकलनेवाले ग़लत तलफ़्फ़ुज़ को दुरुस्त करना न छोड़ते.

एक शायर से उन्होंने पूछ ही डाला कि वो मूल रूप से कहां के रहनेवाले थे. क्योंकि उनकी शायरी में उन्हें पंजाबी छाप दिख गई थी.

"मैं दिल्ली में उनत्तीस सालों से हूं", उन्होंने जवाब दिया.

"सही शब्द उनत्तीस नहीं, बल्कि उनतीस है, यानी अरबी ज़ुबान में 30 में से एक कम."

उस शायर का जोश ठंडा पड़ते देख जोश ने हौसला बंधाते हुए दख़ल दिया और कहा कि उच्चारण में दुरुस्ती को दिल पर न लें और इसे एक बुज़ुर्ग की नसीहत समझें.

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